कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय आरण्यकम्

सप्तमः प्रपाठकः
शीख्‍षा वल्ली
ओं नमः परमात्मने
श्री महागणपतये नमः
श्री गुरुभ्यो नमः, हरिः ओं
ॐ
शन्नो॑ मि॒त्रः शव्ँवरु॑णः⁠। शन्नो॑ भवत्वर्य॒मा⁠। शन्न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पतिः॑⁠। शन्नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः⁠। नमो॒ ब्रह्म॑णे⁠। नम॑स्ते वायो⁠। त्वमे॒व प्र॒त्यख्‍षं॒ ब्रह्मा॑सि⁠। त्वमे॒व प्र॒त्यख्‍षं॒ ब्रह्म॑ वदिष्यामि⁠। ऋ॒तव्ँव॑दिष्यामि⁠। स॒त्यव्ँव॑दिष्यामि⁠। तन्माम॑वतु⁠। तद्व॒क्तार॑मवतु⁠। अव॑तु॒ माम्⁠। अव॑तु व॒क्तारं᳚⁠॥ ओं शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑⁠ ॥ [१] (१५) (स॒त्त्यव्ँव॑दिष्यामि॒ पञ्च॑ च) ॥१॥
शीख्‍षाव्ँव्या᳚ख्यास्या॒मः⁠। वर्णः॒ स्वरः⁠। मात्रा॒ बलम्⁠। साम॑ सन्ता॒नः⁠। इत्युक्तः शी᳚ख्‍षाद्ध्या॒यः⁠ ॥ [२] (५) (शीख्‍षाम् पञ्च॑) ॥२॥
स॒ह नौ॒ यशः⁠। स॒ह नौ ब्र॑ह्मव॒र्चसम्⁠॥ अथातः सꣳहिताया उपनिषदव्ँव्या᳚ख्यास्या॒मः⁠। पञ्चस्वधिक॑रणे॒षु⁠। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रज॑मद्ध्या॒त्मम्⁠। ता महासꣳहिता इ॑त्याच॒ख्‍षते⁠॥ अथा॑धि लो॒कम्⁠। पृथिवी पू᳚र्वरू॒पम्⁠। द्यौरुत्त॑ररू॒पम्⁠। आका॑शः स॒न्धिः⁠ ॥ [३] (१०) वायुः॑ सन्धा॒नम्⁠। इत्य॑धि लो॒कम्⁠॥ अथा॑धि ज्यौ॒तिषम्⁠। अग्निः पू᳚र्व रू॒पम्⁠। आदित्य उत्त॑ररू॒पम्⁠। आ॑पः स॒न्धिः⁠। वैद्युतः॑ सन्धा॒नम्⁠। इत्य॑धि ज्यौ॒तिषम्⁠॥ अथा॑धि वि॒द्यम्⁠। आचार्यः पू᳚र्व रू॒पम्⁠ ॥ [४] (१०) अन्तेवास्युत्त॑ररू॒पम्⁠। वि॑द्या स॒न्धिः⁠। प्रवचन॑ꣳ सन्धा॒नम्⁠। इत्य॑धि वि॒द्यम्⁠॥ अथाधि॒प्रजम्⁠। माता पू᳚र्वरू॒पम्⁠। पितोत्त॑ररू॒पम्⁠। प्र॑जा स॒न्धिः⁠। प्रजनन॑ꣳ सन्धा॒नम्⁠। इत्यधि॒प्रजम्⁠ ॥ [५] (१०) अथाद्ध्या॒त्मम्⁠। अधराहनुः पू᳚र्व रू॒पम्⁠। उत्तराहनुरुत्त॑ररू॒पम्⁠। वाख् स॒न्धिः⁠। जिह्वा॑ सन्धा॒नम्⁠। इत्यद्ध्या॒त्मम्⁠॥ इती माम॑हा स॒ꣳ॒हिताः⁠॥ य एवमेता महासꣳहिता व्याख्या॑ता वे॒द⁠। सन्धीयते प्रज॑या प॒शुभिः⁠। ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्ग्येण॑ (सुवर्गेण॑) लोके॒न⁠ ॥ [६] (१०) (स॒न्धि राचार्यः पू᳚र्वरू॒प मित्यधि॒प्रजम् लो॑के॒न) ॥३॥
यश्छन्द॑सामृष॒भो वि॒श्वरू॑पः⁠। छन्दो॒भ्योऽद्ध्य॒मृता᳚थ् संब॒भूव॑⁠। स मेन्द्रो॑ मे॒धया᳚ स्पृणोतु⁠। अ॒मृत॑स्य देव॒ धार॑णो भूयासम्⁠॥ शरी॑रं मे॒ विच॑र्‌षणम्⁠। जि॒ह्वा मे॒ मधु॑मत्तमा⁠। कर्णा᳚भ्यां॒ भूरि॒ विश्रु॑वम्⁠। ब्रह्म॑णः को॒शो॑ऽसि मे॒धया ऽपि॑हितः⁠। श्रु॒तं मे॑ गोपाय⁠॥ आ॒वह॑न्ती वितन्वा॒ना⁠ ॥ [७] (१०) कु॒र्वा॒णा चीर॑मा॒त्मनः॑⁠। वासा॑ꣳसि॒ मम॒ गाव॑श्च⁠। अ॒न्न॒पा॒ने च॑ सर्व॒दा⁠। ततो॑ मे॒ श्रिय॒माव॑ह⁠। लो॒म॒शां प॒शुभिः॑ स॒ह स्वाहा᳚⁠॥ आमा॑यन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा᳚⁠। विमा॑ऽऽयन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा᳚⁠। प्रमा॑ऽऽयन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा᳚⁠। दमा॑यन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा᳚⁠। शमा॑यन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा᳚⁠ ॥ [८] (१०) यशो॒ जने॑ऽसानि॒ स्वाहा᳚⁠। श्रेया॒न्॒‌वस्य॑सोऽसानि॒ स्वाहा᳚⁠॥ तं त्वा॑ भग॒ प्रवि॑शानि॒ स्वाहा᳚⁠। स मा॑ भग॒ प्रवि॑श॒ स्वाहा᳚⁠। तस्मि᳚नथ् स॒हस्र॑ शाखे⁠। निभ॑गा॒हं त्वयि॑ मृजे॒ स्वाहा᳚⁠॥ यथाऽऽपः॒ प्रव॑ता॒ऽऽयन्ति॑⁠। यथा॒ मासा॑ अहर्ज॒रम्⁠। ए॒वं मां ब्र॑ह्मचा॒रिणः॑⁠। धात॒राय॑न्तु स॒र्वतः॒ स्वाहा᳚⁠॥ प्र॒ति॒वे॒शो॑ऽसि॒ प्र मा॑ भाहि॒ प्र मा॑ पद्यस्व⁠ ॥ [९] (११) (वि॒त॒न्वा॒ना शमा॑यन्तु ब्रह्मचा॒रिणः॒ स्वाहा॒धात॒राय॑न्तु स॒र्वतः॒ स्वाहैक॑म् च) ॥४॥
भूर्भुव॒स्सुव॒रिति॒ वा ए॒ता स्ति॒स्रो व्याहृ॑तयः⁠॥ तासा॑मुहस्मै॒ तां च॑तु॒र्त्थीम्⁠। माहा॑चमस्यः॒ प्रवे॑दयते⁠। मह॒ इति॑⁠॥ तद् ब्रह्म॑⁠। स आ॒त्मा⁠। अङ्गा᳚न्य॒न्या दे॒वताः᳚⁠॥ भूरिति॒ वा अ॒यल्ँलो॒कः⁠। भुव॒ इत्य॒न्तरि॑ख्‍षम्⁠। सुव॒रित्य॒सौ लो॒कः⁠ ॥ [१०] (१०) मह॒ इत्या॑दि॒त्यः⁠। आ॒दि॒त्येन॒ वाव सर्वे॑ लो॒का मही॑यन्ते⁠॥ भूरिति॒ वा अ॒ग्निः⁠। भुव॒ इति॑ वा॒युः⁠। सुव॒रित्या॑दि॒त्यः⁠। मह॒ इति॑ च॒न्द्रमाः᳚⁠। च॒न्द्रम॑सा॒ वाव सर्वा॑णि॒ ज्योती॑ꣳषि॒ मही॑यन्ते⁠॥ भूरिति॒ वा ऋचः॑⁠। भुव॒ इति॒ सामा॑नि⁠। सुव॒ रिति॒ यजू॑ꣳषि⁠ ॥ [११] (१०) मह॒ इति॒ ब्रह्म॑⁠। ब्रह्म॑णा॒ वाव सर्वे॑ वे॒दा मही॑यन्ते⁠॥ भूरिति॒ वै प्रा॒णः⁠। भुव॒ इत्य॑पा॒नः⁠। सुव॒रिति॑ व्या॒नः⁠। मह॒ इत्यन्नं᳚⁠। अन्ने॑न॒ वाव सर्वे᳚ प्रा॒णा मही॑यन्ते⁠॥ ता वा ए॒ताश्चत॑स्र श्चतु॒द्‌र्धा⁠। चत॑स्रश्चतस्रो॒ व्याहृ॑तयः⁠। ता यो वेद॑⁠। स वे॑द॒ ब्रह्म॑⁠। सर्वे᳚ऽस्मै दे॒वा ब॒लिमाव॑हन्ति⁠ ॥ [१२] (१२) (अ॒सौ लो॒को यजू॑ꣳषि॒ वेद॒ द्वे च॑) ॥५॥
स य ए॒षो᳚ऽन्तर्‌हृ॑दय आका॒शः⁠। तस्मि॑न्न॒यं पुरु॑षो मनो॒मयः॑⁠। अमृ॑तो हिर॒ण्मयः॑⁠॥ अन्त॑रेण॒ तालु॑के⁠। य ए॒ष स्तन॑ इवाव॒लंब॑ते⁠। से᳚न्द्र यो॒निः⁠। यत्रा॒सौ के॑शा॒न्तो वि॒वर्त॑ते⁠। व्य॒पोह्य॑ शीर्‌षकपा॒ले⁠॥ भूरित्य॒ग्नौ प्रति॑तिष्ठति⁠। भुव॒ इति॑ वा॒यौ⁠ ॥ [१३] (१०) सुव॒रित्या॑दि॒त्ये⁠। मह॒ इति॒ ब्रह्म॑णि⁠। आ॒प्नोति॒ स्वारा᳚ज्यम्⁠। आ॒प्नोति॒ मन॑स॒स्पति᳚म्⁠। वाक्प॑ति॒ श्चख्‍षु॑ष्पतिः⁠। श्रोत्र॑पति र्वि॒ज्ञान॑पतिः⁠। ए॒तत् ततो॑ भवति⁠। आ॒का॒श श॑रीरं॒ ब्रह्म॑⁠। स॒त्यात्म॑ प्रा॒णारा॑मं॒ मन॑ आनन्दम्⁠। शान्ति॑ समृद्धम॒मृतं᳚⁠॥ इति॑ प्राचीन यो॒ग्योपा᳚स्व⁠ ॥ [१४] (११) (वा॒याव॒मृत॒ मेक॑म् च) ॥६॥
पृ॒थि॒व्य॑न्तरि॑ख्‍षं॒ द्यौर्दिशो॑ऽवान्तरदि॒शाः⁠। अ॒ग्निर्वा॒युरा॑दि॒त्यश्च॒न्द्रमा॒ नख्‍ष॑त्राणि⁠। आप॒ ओष॑धयो॒ वन॒स्पत॑य आका॒श आ॒त्मा⁠। इत्य॑धिभू॒तम्⁠॥ अथाद्ध्या॒त्मम्⁠। प्रा॒णो व्या॒नो॑ऽपा॒न उ॑दा॒नः स॑मा॒नः⁠। चख्‍षुः॒ श्रोत्रं॒ मनो॒ वाक् त्वक्⁠। चर्म॑ मा॒ꣳ॒ सꣴस्नावास्थि॑ म॒ज्जा⁠॥ ए॒त द॑धिवि॒धाय॒र्‌षि॒ रवो॑चत्⁠। पाङ्क्त॒व्ँवा इ॒दꣳ सर्वं᳚⁠। पाङ्क्त॑नै॒व पाङ्क्त॑ꣴ स्पृणो॒तीति॑⁠ ॥ [१५] (११) (सर्व॒मेक॑म् च) ॥७॥
ओमिति॒ ब्रह्म॑⁠॥ ओमिती॒दꣳ सर्व᳚म्⁠॥ ओमित्ये॒तद॑नुकृति हस्म॒ वा अ॒प्यो श्रा॑व॒येत्याश्रा॑वयन्ति⁠। ओमिति॒ सामा॑नि गायन्ति⁠। ओꣳ शोमिति॑ श॒स्त्राणि॑ शꣳसन्ति⁠। ओमित्य॑द्ध्व॒र्युः प्र॑तिग॒रं प्रति॑गृणाति⁠। ओमिति॒ ब्रह्मा॒ प्रसौ॑ति⁠। ओमित्य॑ग्निहो॒त्रमनु॑जानाति⁠। ओमिति॑ ब्राह्म॒णः प्र॑व॒ख्‍ष्यन्ना॑ह॒ ब्रह्मोपा᳚प्नवा॒नीति॑⁠। ब्रह्मै॒वोपा᳚प्नोति⁠ ॥ [१६] (१०) (ओम् दश॑) ॥८॥
ऋतं च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। सत्यं च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। तपश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। दमश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। शमश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। अग्नयश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। अग्निहोत्रं च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। अतिथयश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। मानुषं च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। प्रजा च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। प्रजनश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠। प्रजातिश्च स्वाद्ध्याय प्रव॑चने॒ च⁠॥ सत्यमिति सत्यवचा॑ राथी॒ तरः⁠। तप इति तपोनित्यः पौ॑रुशि॒ष्टिः⁠। स्वाद्ध्याय प्रवचने एवेति नाको॑ मौद्ग॒ल्यः⁠। तद्धि तप॑स्तद्धि॒ तपः⁠ ॥ [१७] (१६) (प्रजा च स्वाद्ध्यायप्रव॑चने॒ च षट्च॑) ॥९॥
अ॒हव्ँवृ॒ख्‍षस्य॒ रेरि॑वा⁠। की॒र्तिः पृ॒ष्ठं गि॒रेरि॑व⁠। ऊ॒द्‌र्ध्व प॑वित्रो वा॒जिनी॑व स्व॒मृत॑मस्मि⁠। द्रवि॑ण॒ꣳ॒ सव॑र्चसम्⁠। सुमेधा अ॑मृतो॒ख्‍षितः⁠। इति त्रिशङ्कोर्वेदा॑नुव॒चनम्⁠ ॥ [१८] (६) (अ॒हꣳ षट्) ॥१०॥
वेदमनूच्या ऽचार्योन्तेवासिनम॑नुशा॒स्ति⁠॥ सत्य॒व्ँवद⁠। धर्मं॒ चर⁠॥ स्वाद्ध्याया᳚न्मा प्र॒मदः⁠। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्य॑वच्छे॒थ्सीः⁠। सत्यान्न प्रम॑दित॒व्यम्⁠। धर्मान्न प्रम॑दित॒व्यम्⁠। कुशलान्न प्रम॑दित॒व्यम्⁠। भूत्यै न प्रम॑दित॒व्यम्⁠। स्वाद्ध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रम॑दित॒व्यम्⁠ ॥ [१९] (१०) देवपितृकार्याभ्यां न प्रम॑दित॒व्यम्⁠॥ मातृ॑देवो॒ भव⁠। पितृ॑देवो॒ भव⁠। आचार्य॑ देवो॒ भव⁠। अतिथि॑देवो॒ भव⁠॥ यान्यनवद्यानि॑ कर्मा॒णि⁠। तानि सेवि॑तव्या॒नि⁠। नो इ॑तरा॒णि⁠॥ यान्यस्माकꣳ सुच॑रिता॒नि⁠। तानि त्वयो॑पास्या॒नि⁠ ॥ [२०] (१०) नो इ॑तरा॒णि⁠॥ ये के चास्मच्छ्रेया॑ꣳसो ब्रा॒ह्मणाः⁠। तेषां त्वयाऽऽसने न प्रश्व॑सित॒व्यम्⁠॥ श्रद्ध॑या दे॒यम्⁠। अश्रद्ध॑याऽदे॒यम्⁠। श्रि॑या दे॒यम्⁠। ह्रि॑या दे॒यम्⁠। भि॑या दे॒यम्⁠। सव्ँवि॑दा दे॒यम्⁠॥ अथ यदि ते कर्मविचिकिथ्सा वा वृत्त विचिकि॑थ्सा वा॒ स्यात्⁠ ॥ [२१] (१०) ये तत्र ब्राह्मणाः᳚ सम्म॒र॒शिनः⁠। युक्ता॑ आयु॒क्ताः⁠। अलूख्‍षा॑ धर्म॑कामाः॒ स्युः⁠। यथा ते॑ तत्र॑ वर्ते॒रन्न्⁠। तथा तत्र॑ वर्ते॒थाः⁠॥ अथाभ्या᳚ख्याते॒षु⁠। ये तत्र ब्राह्मणाः᳚ सम्म॒र्॒‌शिनः⁠। युक्ता॑ आयु॒क्ताः⁠। अलूख्‍षा॑ धर्म॑ कामाः॒ स्युः⁠। यथा ते॑ तेषु॑ वर्ते॒रन्न्⁠ ॥ [२२] (१०) तथा तेषु॑ वर्ते॒थाः⁠॥ एष॑ आदे॒शः⁠। एष उ॑पदे॒शः⁠। एषा वे॑दोप॒निषत्⁠। एतद॑नुशा॒सनम्⁠। एव मुपा॑सित॒व्यम्⁠। एव मुचैत॑दुपा॒स्यम्⁠ ॥ [२३] (७) (स्वाद्ध्यायप्रवचनाभ्याम् न प्रम॑दित॒व्यम् तानित्वयो॑पास्या॒नि स्यात् तेषु॑ वर्ते॒रन्थ् +स॒प्त च॑) ॥११॥
शन्नो॑ मि॒त्रः शव्ँवरु॑णः⁠। शन्नो॑ भवत्वर्य॒मा⁠। शन्न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पतिः॑⁠। शन्नो॒ विष्णु॑ रुरुक्र॒मः⁠। नमो॒ ब्रह्म॑णे⁠। नम॑स्ते वायो⁠। त्वमे॒व प्र॒त्यख्‍षं॒ ब्रह्मा॑सि⁠। त्वामे॒व प्र॒त्यख्‍षं॒ ब्रह्मा वा॑दिषम्⁠। ऋ॒तम॑वादिषम्⁠। स॒त्यम॑वादिषं⁠। तन्मामा॑वीत्⁠। तद्व॒क्तार॑मावीत्⁠। आवी॒न्माम्⁠। आवी᳚द्व॒क्तार᳚म्⁠॥ ओं शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑⁠ ॥ [२४] (१५) (स॒त्यम॑वादिष॒म् पञ्च॑ च) ॥१२॥
अनुवाकाः पञ्चशती
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