कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय ब्राह्मणम्
तृतीयाष्टके चतुर्थः प्रपाठकः

अष्टक ३ प्रपाठक ४
पुरुषमेधः

ओं नमः परमात्मने, श्री महागणपतये नमः

श्री गुरुभ्यो नमः, ह॒रिः॒ ओं

ॐ
पुरुषमेधः
ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णमाल॑भते⁠। ख्‍ष॒त्राय॑ राज॒न्य᳚म्⁠। म॒रुद्भ्यो॒ वैश्य᳚म्⁠। तप॑से शू॒द्रम्⁠। तम॑से॒ तस्क॑रम्⁠। नार॑काय वीर॒हण᳚म्⁠। पा॒प्मने᳚ क्ली॒बम्⁠। आ॒क्र॒याया॑यो॒गूम्⁠। कामा॑य पुꣴश्च॒लूम्⁠। अति॑क्रुष्टाय माग॒धम्⁠ ॥ [१] (१०) ॥१॥
गी॒ताय॑ सू॒तम्⁠। नृ॒त्ताय॑ शैलू॒षम्⁠। धर्मा॑य सभाच॒रम्⁠। न॒र्माय॑ रे॒भम्⁠। नरि॑ष्ठायै भीम॒लम्⁠। हसा॑य॒ कारि᳚म्⁠। आ॒न॒न्दाय॑ स्त्रीष॒खम्⁠। प्र॒मुदे॑ कुमारीपु॒त्रम्⁠। मे॒धायै॑ रथका॒रम्⁠। धैर्या॑य॒ तख्‍षा॑णम्⁠ ॥ [२] (१०) ॥२॥
श्रमा॑य कौला॒लम्⁠। मा॒यायै॑ कार्मा॒रम्⁠। रू॒पाय॑ मणिका॒रम्⁠। शुभे॑ व॒पम्⁠। श॒र॒व्या॑या इषुका॒रम्⁠। हे॒त्यै ध॑न्वका॒रम्⁠। कर्म॑णे ज्याका॒रम्⁠। दि॒ष्टाय॑ रज्जुस॒र्गम्⁠। मृ॒त्यवे॑ मृग॒युम्⁠। अन्त॑काय श्व॒नित᳚म्⁠ ॥ [३] (१०) ॥३॥
स॒न्धये॑ जा॒रम्⁠। गे॒हायो॑पप॒तिम्⁠। निर्‌ऋ॑त्यै परिवि॒त्तम्⁠। आर्त्यै॑ परिविविदा॒नम्⁠। अरा᳚द्ध्यै दिधिषू॒पति᳚म्⁠। प॒वित्रा॑य भि॒षज᳚म्⁠। प्र॒ज्ञाना॑य नख्‍षत्रद॒र॒शम्⁠। निष्कृ॑त्यै पेशस्का॒रीम्⁠। बला॑यो प॒दाम्⁠। वर्णा॑यानू॒रुध᳚म्⁠ ॥ [४] (१०) ॥४॥
न॒दीभ्यः॑ पौञ्जि॒ष्टम्⁠। ऋ॒ख्‍षीका᳚भ्यो॒ नैषा॑दम्⁠। पु॒रु॒ष॒व्या॒घ्राय॑ दु॒र्मद᳚म्⁠। प्र॒युद्भ्य॒ उन्म॑त्तम्⁠। ग॒न्ध॒र्वा॒फ्स॒राभ्यो॒ व्रात्य᳚म्⁠। स॒र्प॒दे॒व॒ज॒नेभ्योऽप्र॑तिपदम्⁠। अवे᳚भ्यः कित॒वम्⁠। इ॒र्यता॑या॒ अकि॑तवम्⁠। पि॒शा॒चेभ्यो॑ बिदलका॒रम्⁠। या॒तु॒धाने᳚भ्यः कण्टकका॒रम्⁠ ॥ [५] (१०) ॥५॥
उ॒थ्सा॒देभ्यः॑ कु॒ब्जम्⁠। प्र॒मुदे॑ वाम॒नम्⁠। द्वा॒र्भ्यः स्रा॒मम्⁠। स्वप्ना॑या॒न्धम्⁠। अध॑र्माय बधि॒रम्⁠। स॒ज्ञांना॑य स्मरका॒रीम्⁠। प्र॒का॒मोद्या॑योप॒सद᳚म्⁠। आ॒शि॒ख्‍षायै᳚ प्र॒श्निन᳚म्⁠। उ॒प॒शि॒ख्‍षाया॑ अभिप्र॒श्निन᳚म्⁠। म॒र्यादा॑यै प्रश्नविवा॒कम्⁠ ॥ [६] (१०) ॥६॥
ऋत्यै᳚ स्ते॒नहृ॑दयम्⁠। वैर॑हत्याय॒ पिशु॑नम्⁠। विवि॑त्त्यै ख्‍ष॒त्तार᳚म्⁠। औप॑द्रष्टाय संग्रही॒तार᳚म्⁠। बला॑यानुच॒रम्⁠। भू॒म्ने प॑रिष्क॒न्दम्⁠। प्रि॒याय॑ प्रियवा॒दिन᳚म्⁠। अरि॑ष्ट्या अश्वसा॒दम्⁠। मेधा॑य वासः पल्पू॒लीम्⁠। प्र॒का॒माय॑ रजयि॒त्रीम्⁠ ॥ [७] (१०) ॥७॥
भायै॑ दार्वाहा॒रम्⁠। प्र॒भाया॑ आग्ने॒न्धम्⁠। नाक॑स्य पृ॒ष्ठाया॑भिषे॒क्तार᳚म्⁠। ब्र॒द्ध्नस्य॑ वि॒ष्टपा॑य पात्रनिर्णे॒गम्⁠। दे॒व॒लो॒काय॑ पेशि॒तार᳚म्⁠। म॒नु॒ष्य॒लो॒काय॑ प्रकरि॒तार᳚म्⁠। सर्वे᳚भ्यो लो॒केभ्य॑ उपसे॒क्तार᳚म्⁠। अव॑र्त्यै व॒धायो॑पमन्थि॒तार᳚म्⁠। सुव॒र्गाय॑ लो॒काय॑ भाग॒दुघ᳚म्⁠। वर्‌षि॑ष्ठाय॒ नाका॑य परिवे॒ष्टार᳚म्⁠ ॥ [८] (१०) ॥८॥
अर्मे᳚भ्यो हस्ति॒पम्⁠। ज॒वाया᳚श्व॒पम्⁠। पुष्ट्यै॑ गोपा॒लम्⁠। तेज॑सेऽजपा॒लम्⁠। वी॒र्या॑याविपा॒लम्⁠। इरा॑यै की॒नाश᳚म्⁠। की॒लाला॑य सुराका॒रम्⁠। भ॒द्राय॑ गृह॒पम्⁠। श्रेय॑से वित्त॒धम्⁠। अद्ध्य॑ख्‍षायानुख्‍ष॒त्तार᳚म्⁠ ॥ [९] (१०) ॥९॥
म॒न्यवे॑ऽयस्ता॒पम्⁠। क्रोधा॑य निस॒रम्⁠। शोका॑याभिस॒रम्⁠। उ॒त्कू॒ल॒वि॒कू॒लाभ्यां᳚ त्रि॒स्थिन᳚म्⁠। योगा॑य यो॒क्तार᳚म्⁠। ख्‍षेमा॑य विमो॒क्तार᳚म्⁠। वपु॑षे मानस्कृ॒तम्⁠। शीला॑याञ्जनीका॒रम्⁠। निर्‌ऋ॑त्यै कोशका॒रीम्⁠। य॒माया॒सूम्⁠ ॥ [१०] (१०) ॥१०॥
य॒म्यै॑ यम॒सूम्⁠। अथ॑र्व॒भ्योऽव॑तोकाम्⁠। स॒व्ँव॒थ्स॒राय॑ पर्या॒रिणी᳚म्⁠। प॒रि॒व॒थ्स॒रायावि॑जाताम्⁠। इ॒दा॒व॒थ्स॒राया॑प॒स्कद्व॑रीम्⁠। इ॒द्व॒थ्स॒राया॒तीत्व॑रीम्⁠। व॒थ्स॒राय॒ विज॑र्जराम्⁠। स॒र्व॒थ्सं॒राय॒ पलि॑क्नीम्⁠। वना॑य वन॒पम्⁠। अ॒न्यतो॑रण्याय दाव॒पम्⁠ ॥ [११] (१०) ॥११॥
सरो᳚भ्यो धैव॒रम्⁠। वेश॑न्ताभ्यो॒ दाश᳚म्⁠। उ॒प॒स्थाव॑रीभ्यो॒ बैन्द᳚म्⁠। न॒ड्व॒लाभ्यः॑ शौष्क॒लम्⁠। पा॒र्या॑य कैव॒र्तम्⁠। अ॒वा॒र्या॑य मार्गा॒रम्⁠। ती॒र्थेभ्य॑ आ॒न्दम्⁠। विष॑मेभ्यो मैना॒लम्⁠। स्वने᳚भ्यः॒ पर्ण॑कम्⁠। गुहा᳚भ्यः॒ किरा॑तम्⁠। सानु॑भ्यो॒ जम्भ॑कम्⁠। पर्व॑तेभ्यः॒ किं पू॑रुषम्⁠ ॥ [१२] (१२) ॥१२॥
प्र॒ति॒श्रुत्का॑या ऋतु॒लम्⁠। घोषा॑य भ॒षम्⁠। अन्ता॑य बहुवा॒दिन᳚म्⁠। अ॒न॒न्ताय॒ मूक᳚म्⁠। मह॑से वीणावा॒दम्⁠। क्रोशा॑य तूणव॒द्ध्मम्⁠। आ॒क्र॒न्दाय॑ दुन्दुभ्याघा॒तम्⁠। अ॒व॒र॒स्प॒राय॑ शङ्ख॒द्ध्मम्⁠। ऋ॒भुभ्यो॑ऽजिनसन्धा॒यम्⁠। सा॒द्ध्येभ्य॑श्चर्म॒म्णम्⁠ ॥ [१३] (१०) ॥१३॥
बी॒भ॒थ्सायै॑ पौल्क॒सम्⁠। भूत्यै॑ जागर॒णम्⁠। अभू᳚त्यै स्वप॒नम्⁠। तु॒लायै॑ वाणि॒जम्⁠। वर्णा॑य हिरण्यका॒रम्⁠। विश्वे᳚भ्यो दे॒वेभ्यः॑ सिद्ध्म॒लम्⁠। प॒श्चा॒द्दो॒षाय॑ ग्ला॒वम्⁠। ऋत्यै॑ जनवा॒दिन᳚म्⁠। व्यृ॑द्ध्या अपग॒ल्भम्⁠। स॒ꣳ॒श॒राय॑ प्र॒च्छिद᳚म्⁠ ॥ [१४] (१०) ॥१४॥
हसा॑य पुꣴश्च॒लूमाल॑भते⁠। वी॒णा॒वा॒दं गण॑कं गी॒ताय॑⁠। याद॑से शाबु॒ल्याम्⁠। न॒र्माय॑ भद्रव॒तीम्⁠। तू॒ण॒व॒द्ध्मं ग्रा॑म॒ण्यं॑ पाणिसंघा॒तं नृ॒त्ताय॑⁠। मोदा॑यानु॒क्रोश॑कम्⁠। आ॒न॒न्दाय॑ तल॒वम्⁠ ॥ [१५] (७) ॥१५॥
अ॒ख्‍ष॒रा॒जाय॑ कित॒वम्⁠। कृ॒ताय॑ सभा॒विन᳚म्⁠। त्रेता॑या आदिनवद॒र्॒‌शम्⁠। द्वा॒प॒राय॑ बहिः॒ सद᳚म्⁠। कल॑ये सभास्था॒णुम्⁠। दु॒ष्कृ॒ताय॑ च॒रका॑चार्यम्⁠। अद्ध्व॑ने ब्रह्मचा॒रिण᳚म्⁠। पि॒शा॒चेभ्यः॑ सैल॒गम्⁠। पि॒पा॒सायै॑ गोव्य॒च्छम्⁠। निर्‌ऋ॑त्यै गोघा॒तम्⁠। ख्‍षु॒धे गो॑विक॒र्तम्⁠। ख्‍षु॒त्तृ॒ष्णाभ्यां॒ तम्⁠। यो गाव्ँवि॒कृन्त॑न्तं मा॒ꣳ॒सं भिख्‍ष॑माण उप॒तिष्ठ॑ते⁠ ॥ [१६] (१३) ॥१६॥
भूम्यै॑ पीठस॒र्पिण॒माल॑भते⁠। अ॒ग्नये॑ऽꣳस॒लम्⁠। वा॒यवे॑ चाण्डा॒लम्⁠। अ॒न्तरि॑ख्‍षाय वꣳशन॒र्तिन᳚म्⁠। दि॒वे ख॑ल॒तिम्⁠। सूर्या॑य हर्य॒ख्‍षम्⁠। च॒न्द्रम॑से मिर्मि॒रम्⁠। नख्‍ष॑त्रेभ्यः कि॒लास᳚म्⁠। अह्ने॑ शु॒क्लं पि॑ङ्ग॒लम्⁠। रात्रि॑यै कृ॒ष्णं पि॑ङ्गा॒ख्‍षम्⁠ ॥ [१७] (१०) ॥१७॥
वा॒चे पुरु॑ष॒माल॑भते⁠। प्रा॒णम॑पा॒नव्ँव्या॒नमु॑दा॒नꣳ स॑मा॒नं तान्‌वा॒यवे᳚⁠। सूर्या॑य॒ चख्‍षु॒राल॑भते⁠। मन॑श्च॒न्द्रम॑से⁠। दि॒ग्म्यः श्रोत्र᳚म्⁠। प्र॒जाप॑तये॒ पुरु॑षम्⁠ ॥ [१८] (६) ॥१८॥
अथै॒तानरू॑पेभ्य॒ आल॑भते⁠। अति॑ह्रस्व॒मति॑दीर्घम्⁠। अति॑कृश॒मत्य॑ꣳसलम्⁠। अति॑शुक्ल॒मति॑कृष्णम्⁠। अति॑श्लख्‍ष्ण॒मति॑लोमशम्⁠। अति॑किरिट॒मति॑दन्तुरम्⁠। अति॑मिर्मिर॒मति॑मेमिषम्⁠। आ॒शायै॑ जा॒मिम्⁠। प्र॒ती॒ख्‍षायै॑ कुमा॒रीम्⁠ ॥ [१९] (९) ॥१९॥
अनुवाकाः पञ्चशती
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